-डॉ. शुभ्रता मिश्रा (विज्ञान लेखिका, गोवा)

ह सर्वविदित है कि महान भारतीय वैज्ञानिक भारत रत्न सर चंद्रशेखर वेंकट रमन ने 28 फरवरी 1928 को रमन प्रभाव की खोज की थी और उसी दिन को भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक विशेष थीम के साथ 28 फरवरी 1987 से प्रतिवर्ष देश में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाए जाने की परंपरा जारी है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2022 की थीम सतत भविष्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एकीकृत दृष्टिकोण रखी गई है। इस थीम के चयन का मूल उद्देश्य समाज में विज्ञान से संबंधित मुद्दों और विषयों की सार्वजनिक सराहना को बढ़ावा देना है। इस वर्ष की यह थीम निश्चित रुप से रमन की उस समय की चिंता का एक सटीक समाधान कहा जा सकता है, जब वर्ष 1930 में भौतिकी के ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्त करने के पश्चात् भारत लौटने पर रमन ने कहा था कि ’’मेरे जैसे न जाने कितने ही रमन सुविधाओं और अवसरों के अभाव में यूं ही अपनी प्रतिभाओं को गुमनामी के अंधेरों में तिरोहित करने को बाध्य होते हैं, जिससे केवल उनका ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष का नुकसान है, जिसे हमें रोकना होगा।’’

इसी तरह वर्ष 2021 के राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की थीम महिलाओं को विज्ञान के उच्च अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ’’विज्ञान में महिलायें’’ रखी गई थी। एक बार सर सी वी रमन ने इस संदर्भ में अपने विचार कुछ इस तरह प्रस्तुत किए थे कि “मुझे लगता है यदि हमारे भारत की स्त्रियां विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के साथ साथ विज्ञान की प्रगति और उन्नति हेतु शोधकार्य में भी रुचि लेने लगें, तो निःसंदेह वे वह हासिल कर लेंगी, जो देश के पुरुष वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए हैं।”  रमन अपनी इस बात का आगे स्पष्टीकरण करते हैं कि “स्त्रियों में जो समर्पण का एक जन्मजात गुण होता है, वही उन्हें एक महान वैज्ञानिक बनाने में सबसे बड़ा सहायक साबित हो सकता है, क्योंकि समर्पण का भाव विज्ञान में सफलता के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है।”  रमन यहां एक और बात कहते हैं कि “हमें इस भ्रम में बिल्कुल नहीं रहना चाहिए कि विज्ञान का अध्ययन केवल पुरुषों का विशेषाधिकार है।”

स्त्रियों के प्रति इतनी स्पष्ट, गहरी और सम्मानित सोच रखने के बावजूद भी प्रोफेसर रमन के स्त्रीवादी दृष्टिकोण को लेकर अक्सर जो बातें सामने आती रही हैं, उनमें एक बात बड़ी विचारणीय है कि क्यों ऐसा माना जाता है कि रमन वैज्ञानिक शोधों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर अधिक आश्वस्त नहीं हुआ करते थे? प्रोफेसर रमन के महिला शोधार्थियों के प्रति पूर्वाग्रहों के संदर्भ में प्रचलित एक आख्यान डॉ. कमला भागवत के भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलौर में प्रवेश से लेकर जुड़ा हुआ है। विज्ञान जगत से जुड़े लोग जानते हैं कि बॉम्बे विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी की डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त करने वाली कमला भागवत (जिनका बाद में डॉ. कमला सोहोनी नाम हुआ) ने सन् 1933 में जैव रसायन में एक शोध छात्रा के रूप में जब भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बंगलौर में प्रवेश लेना चाहा था, तब ऐसा कहा जाता है कि संस्थान के तत्कालीन निदेशक सर सी वी रमन ने उन्हें प्रवेश देने से सिर्फ इसलिए इंकार कर दिया था, क्योंकि वे एक लड़की थीं। हांलाकि कमला भागवत की हठ को देखते हुए सर सी वी रमन ने सशर्त उन्हें प्रवेश दिया और मेधावी कमला ने अपने विदुषत्व से रमन के इस भ्रम को तोड़ा कि महिला शोधार्थी वैज्ञानिक संस्थानों में निष्ठापूर्वक कार्य नहीं कर सकतीं।

kamala sohonie

यद्यपि यह संदर्भ हम जैसे लेखकों और पाठकवर्ग के लिए दुविधा में डालने जैसा है, परंतु यह भी उतना ही सच है हम उस स्तर तक पहुंचने वालों में कदापि नहीं हैं कि प्रोफेसर रमन और प्रोफेसर भागवत जैसी दोनों महान विभूतियों के लिए कही गईं बातों पर प्रश्नचिन्ह लगा सकें। हां यह अवश्य सच है कि सन् 1933 में ऐसा कुछ हुआ होगा, जो रमन की तत्कालीन भारतीय स्त्रीवादी सोच के प्रति दृष्टिकोण को समझने के लिए एक सामाजिक शोध का विषय बन सकता है। संभव है कि कमला भागवत एवं उनके बाद की दूसरी और शोधार्थियों की लगन और निष्ठा ने रमन की विज्ञान के क्षेत्र के लिए बनी स्त्रीवादी सोच में परिवर्तन ला दिया हो।

बात उन दिनों की है, जब भारत अंग्रेजों के अधीन था, समाज में महिलाओं की स्थिति आज के जैसी नहीं थी। यह वह दौर था, जिसमें स्त्रियों के मूलभूत शिक्षा ग्रहण करने जैसे मुद्दे तत्कालीन समाज सुधारकों की सोच और संघर्ष की सफलताओं पर टिके हुए थे। ऐसे में विज्ञान विषयों में लड़कियों के शोध करने जैसी बात को स्वीकार कर पाने में संदेह होना स्वाभाविक माना जा सकता है। लोगों ने रमन की इस सोच को संकीर्णता के दायरे में बांधना चाहा और उनके नोबेल पुरस्कार विजेता होने को इससे जोड़ा। लेकिन यहां यह स्पष्ट करना समीचीन होगा कि रमन को नोबेल पुरस्कार उनके वैज्ञानिक शोध के लिए मिला था, न कि उस दौर में स्त्रियों की शिक्षित किए जाने के बारे में चल रही सामाजिक सोच को सहज ही स्वीकार कर पाने के लिए था। यदि किंवदंतियों को सच भी माना जाए, तो भी वैज्ञानिक शोध सिर्फ पुरुषों का ही कार्यक्षेत्र हो सकता है, उनके इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने का एक कारण यह भी हो सकता था, कि तब तक लड़कियां इतनी संख्या में विज्ञान के क्षेत्र में आ ही नहीं पाई थीं, कि रमन उस समय के समाज में व्याप्त स्त्रीवादी सोच को मिटा सकने के लिए स्वयं को बाध्य कर पाते।

यहां तक कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जब उद्योगपति जमशेदजी एन. टाटा भारत की वैज्ञानिक प्रतिभाओं के विकास के लिए देश में एक अतिउत्कृष्ट वैज्ञानिक शोध संस्थान को स्थापित करने के लिए कड़े परिश्रम कर रहे थे, तब भी इसके केंद्र में स्थित सोच में पुरुषप्रधानता ही व्याप्त थी। निःसंदेह, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में अमेरिका की जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी को मॉडल मानते हुए उसकी तर्ज पर भारत में किसी वैज्ञानिक संस्थान को स्थापित करवा पाना बड़ी टेढ़ी खीर थी। तत्कालीन मैसूर दीवान शेषाद्री अय्यर और शिक्षाविद् वर्जोरजी पदशाह सहित अपने प्रमुख मित्रों और सहयोगियों के साथ मिलकर किए गए अथक प्रयासों के बाद जमशेदजी टाटा को अंततः उस समय सफलता मिल पाई, जब सन् 1899 में शिमला सम्मेलन में इस संबंध में हुए गहन विचार-विमर्श में ब्रिटिश सरकार ने यह निर्णय लिया कि भारत में विज्ञान संस्थान बनाया जा सकता है। हालांकि जमशेदजी अपने वैज्ञानिक संस्थान को साकार रुप में नहीं देख पाए, क्योंकि सन् 1904 में उनकी मृत्यु हो गई और लगभग पांच वर्षों के बाद 27 मई 1909 को बंगलौर में भारतीय विज्ञान संस्थान की विधिवत स्थापना हुई। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा वैज्ञानिक शोध संस्थान बना।

दूसरी ओर लगभग इसी दौर में अर्थात् 1908-09 में बीस वर्षीय चंद्रशेखर वेंकट रमन को कलकत्ता के महेंद्र लाल सिरकार द्वारा सन् 1876 में स्थापित किए गए भारत के प्रथम वैज्ञानिक शोध संस्थान  इंडियन एसोसिएशन ऑफ द कल्टिवेशन ऑफ साइंस (आईएसीएस) में ध्वनि विज्ञान तथा प्रकाशिकी जैसे विषयों में स्वतंत्र रुप से अनुसंधान करने की अनुमति मिली थी। सर चन्द्रशेखर वेंकट रमन ने इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस में 1908 से 1933 तक भौतिकी के अनेक तथ्यों पर अनवरत शोधकार्य किए। इसी अवधि में ही उन्होंने ‘रमन प्रभाव’ जैसी महान प्रकाशीय खोज करने में सफलता पाई, जिसने उन्हें विश्व का लोकप्रिय वैज्ञानिक बना दिया। सर सी वी रमन एशिया के ऐसे पहले व्यक्ति बने, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ था। कलकत्ता में रहने के दौरान सर सी वी रमन सन् 1919 से 1933 तक आईएसीएस के मानद सचिव भी रहे थे। इसके बाद सर रमन 1933 में ही बैंगलोर में भारतीय विज्ञान संस्थान आ गए थे और वे इस संस्थान के पहले भारतीय निदेशक भी बने। सर सी वी रमन के निदेशक के रुप में नियुक्त होने तक भारतीय विज्ञान संस्थान ने लगभग पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए थे।

देश के इन दोनों उत्कृष्ट वैज्ञानिक संस्थानों में काम करने के दौरान रमन ने एक या दो भारतीय छात्राओं को ही शोधकार्य करते सुना होगा। सिर्फ भारतीय विज्ञान संस्थान के दस्तावेजों का अवलोकन करें तो पाएंगे कि प्रारंभिक लगभग एक दशक तक वहां केवल छात्र शोधार्थी ही अध्ययन करते थे। डोरोथी नॉरिस आईआईएससी में सन् 1917 में अनुप्रयुक्त रसायन विज्ञान में रीडर नियुक्त की जाने वाली पहली महिला संकाय सदस्य थीं, जो बाद में वहां जैव रसायन विज्ञान की प्रोफेसर भी बनीं। जहां तक छात्राओं के प्रवेश की बात की जाए तो सन् 1920 और 1922 में दो छात्राओं एक मिस एम एम मेहता और दूसरी मिस आर के क्रिस्टी के नामों के उल्लेख मिलते हैं, लेकिन इन दोनों छात्राओं ने इस संस्थान में अपनी शिक्षा पूरी की अथवा नहीं, इसकी विस्तृत कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसके बाद सीधे सन् 1933 में कमला भागवत के भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रवेश लेने की जानकारी मिलती है।

कमला भागवत को भारतीय विज्ञान संस्थान की पहली छात्रा माना जाता है, जिन्होंने सन् 1936 तक संस्थान में अध्ययन किया और फिर वे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चली गईं। वहां से सन् 1939 में विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला के नाम से विख्यात हैं। हांलाकि कमला भागवत से पहले भारतीय वनस्पति वैज्ञानिक जानकी अम्माल ने सन् 1931 में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से वनस्पतिशास्त्र में डीएससी की उपाधि प्राप्त की थी। निःसंदेह सर सी वी रमन जानकी अम्माल की वैज्ञानिक मेधा से भी परिचित रहे होंगे। इसके अलावा वर्ष 1903 में भौतिकी और वर्ष 1911 में रसायन विज्ञान के लिए दो बार नोबेल विजेता रहीं विश्व प्रसिद्ध मेडम क्यूरी और वर्ष 1935 में रसायन विज्ञान की नोबेल पुरस्कार विजेता क्यूरी की ही बड़ी बेटी आइरीन जैसी महिलाओं के विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत शोधकार्य कर पाने की क्षमताएं भारतीय छात्राओं में न हो पाने का संदेह शायद सर सी वी रमन की सोच में रहा हो। लेकिन यदि गहराई से सोचा जाए, तो ऐसा लगता है कि कमला भागवत को भारतीय विज्ञान संस्थान में अंततः प्रवेश देने वाले सर रमन सच में ऐसी कोई पूर्वाग्रही सोच कतई नहीं रखते होंगे।

यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कमला भागवत को भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रवेश न दिए जाने के पीछे के कारणों में संभवतः उनकी मेधा पर संदेह करना न रहा हो, वरन् लड़कियों के प्रति उस समय की सामाजिक सोच ने कमला के वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर खरे उतरने के उद्देश्य से उन पर इतने कठोर प्रतिबंध प्रोफेसर रमन ने लगाए होंगे। हांलाकि एक सुखद तथ्य यह भी संकेत देता है कि कमला भागवत के बाद से ही अपने निदेशक काल के दौरान रमन ने छात्राओं के लिए भारतीय विज्ञान संस्थान के द्वार खोलने की विधिवत घोषणा की थी। उनके मार्गदर्शन में मोतियों और हीरों के स्पेक्ट्रम पर शोधकार्य करने वाली अन्ना मणि तथा कई और भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने भी रमन के साथ काम करते समय अनुभव किए उनके सख्त रवैयों का कई बार जिक्र किया है। यह भी संभव है कि उस दौर में लगभग घरों में सीमित रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति और उनके प्रति उत्तरदायित्व की भावना को लेकर भी रमन की चिंता रहती हो, जिसे वे व्यक्त न करते रहे हों। इसका एक कारण है कि संस्थानों की अवसंरचना स्त्रियों की जरुरतों को ध्यान में रखकर नहीं की जाती थीं, यहां तक कि जब कमला भागवत ने भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रवेश लिया, तो उनके खाने-पीने, आवास, आदि मूलभूत जरुरतों का भी अलग से प्रबंध करवाया गया था। कालांतर में धीरे धीरे जब महिला शोधार्थियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई तो महिला छात्रावास बनाए गए। रमन की प्रयोगशाला में शोधकार्य करने वाली महिला शोधार्थियों के अपने सहकर्मियों के साथ अकारण मित्रता या बात करने पर भी प्रतिबंध के तथ्य पढ़ने में आते हैं। इसके पीछे रमन की कोई संकीर्ण सोच नहीं रही होगी, बल्कि इस सोच के पीछे का कारण संभवतः यह रहा होगा कि महिला वैज्ञानिक निर्बाध रुप से अपने शोधों को पूर्ण समर्पण और निष्ठा से कर सकें।  महिला शोधार्थियों के प्रति उनका व्यवहार भले ही अनुशासनात्मक तौर पर कठोर रहा हो, लेकिन देश में स्त्री शिक्षा को लेकर रमन का दृष्टिकोण सदैव सकारात्मक ही रहा था।

सर सी वी रमन की भारतीय महिलाओं को शिक्षित किए जाने के दृष्टिकोण की पुष्टि तत्कालीन प्रसिद्ध अंग्रेजी समाचारपत्र केसरी हिंद के 7 जुलाई 1935  में प्रकाशित एक समाचार से और भी हो जाती है। इसमें स्पष्ट रुप से इस बात का उल्लेख मिलता है कि देश के प्रथम महिला विश्वविद्यालय श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसी महिला विश्वविद्यालय (एसएनडीटी), मुम्बई के वार्षिक दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में अपने संबोधन में सर सीवी रमन ने कहा था कि “दुनिया का कोई भी देश जो अपनी स्त्रीशक्ति को शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों से वंचित रखता है, उसे कभी भी एक उत्कृष्ट राष्ट्र बनने की आशा नहीं रखनी चाहिए।” उनका विचार था कि तत्कालीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों के लिए कुछ ऐसा हो रहा था, जो मौलिक रूप से गलत था, जिसके कारण देश पिछड़ा हुआ था और समाज में निराशा का वातावरण बना हुआ था। रमन हर स्त्री में उस मां के दर्शन करते थे, जो प्रत्येक छोटे-बड़े व्यक्ति के शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक चरित्र का सृजन करती है। इसलिए उनका मानना था कि स्त्रियों को ज्ञान और शिक्षा से वंचित रखना एक राष्ट्रीय अपराध की भांति है।

निश्चित रुप से जिस भारत में सर सी वी रमन जैसे विज्ञान कर्णधार और स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना रखने वाले मनीषी रहे हैं, वहां महिला वैज्ञानिकों की संख्या में निरंतर वृद्धि स्वाभाविक बात है। भारत की पहली महिला फिजीशयन आनंदीबाई गोपालराव जोशी और महिला वैज्ञानिक जानकी अम्माल से लेकर कमला भागवत सोहोनी, राजेश्वरी चटर्जी, विभा चौधरी, दर्शन रंगनाथन, असीमा चटर्जी, रोहिणी गोडबोले, मंगला नार्लीकर, अदिति पंत, इंदिरा हिंदुजा, परमजीत खुराना, सुनेत्रा गुप्ता, नंदिनी हरिनाथ, टेसी थॉमस, चारुसिता चक्रवर्ती, आदि अनेक भारतीय महिला वैज्ञानिकों जैसी स्त्रीशक्ति ने भारत को पिछड़े देश की संज्ञा से उबारकर विश्व का विकासशील राष्ट्र बनाया है।

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