लेखक: डॉ. सुभाष चंद्र लखेड़ा

स तथ्य से हम परिचित हैं कि वैज्ञानिक और  तकनीकी  विशेषज्ञों  की संख्या के हिसाब से हम दुनिया के शीर्षस्थ देशों की श्रेणी में हैं। खेद की बात यह है कि  वैज्ञानिक दृष्टिकोण के स्तर पर हम आज भी कंगाल हैं।  हमारे यहां अक्सर  समाज को वैज्ञानिक ढंग से सोचने की सलाह दी जाती है। हम यह भूल जाते हैं कि वैज्ञानिक ढंग से वही सोच सकता है जो वैज्ञानिक ढंग से जीना जानता है; जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो और तर्क के आधार पर विश्लेषण कर  किसी सवाल विशेष पर सोचने में सक्षम हो। अगर हमारे नागरिकों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक होता तो क्या हमारे यहां  नरबली,  डायन और  सती  प्रथा से जुड़े  दर्दनाक हादसे मीडिया में अपनी उपस्थिति अभी तक  बनाये रख सकते थे?  ताज्जुब की बात तो यह है कि  विकसित प्रौद्योगिकी की वजह से  देश में हुई  संचार क्रांति का इस्तेमाल  ढोंग और पाखंड फैलाने के लिए किया जा रहा है। टेलीविजन पर शायद ही कोई ऐसा निजी समाचार चैनल होगा जो इस ढोंग और पाखंड को  बढ़ाने में पीछे हो। समाज में लंबे समय से  यह धारणा बनी हुई है कि नेताओं, अफसरों, ठेकेदारों, और  पुलिस की मिली भगत से  आर्थिक भ्रष्टाचार पनपा है लेकिन मानसिक भ्रष्टाचार  पर आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। आर्थिक  भ्रष्टाचार को रोकने के लिए  दंड की व्यवस्था है किन्तु वैज्ञानिक सोच के अभाव में जो मानसिक भ्रष्टाचार फैलाया जा  रहा है, उसे रोकने के लिए अभी तक किसी भी दंड की व्यवस्था नहीं है। यही  वजह है कि  इस धंधे  में लिप्त  लोग  समाज को मानसिक दृष्टि से पंगु  बनाकर अपना हित साध रहे  हैं और टीवी के कतिपय खबरिया चैनलों  की आमदनी में भी इजाफा कर रहे हैं। पंडितों अथवा संतों की वेशभूषा का इस्तेमाल करने वाले ऐसे लोग समाज में अवैज्ञानिक धारणाओं को फैलाने में महारत हासिल कर चुके हैं। आस्था का बुनियादी सवाल उठाकर ये लोग अच्छे खासे प्रबुद्ध लोगों को चुप कराने के लिए सभी कुतर्कों का इस्तेमाल  कर लेते हैं। इनके बड़े भाई यानी तथाकथित तांत्रिक टीवी चैनलों पर तो नहीं आते किन्तु इनके विज्ञापन मीडिया में प्रतिदिन आते हैं।

बहरहाल, इनके कृत्य को मानसिक भ्रष्टाचार इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि ये लोगों के दिलो – दिमाग  को  अपनी ऊलजलूल बातों से दूषित करते हैं। ये अवैज्ञानिक बातों से  लोगों को दिग्भर्मित करते हैं और उनकी  प्रगति को बाधित करते हैं। एक बार टीवी के  एक खबरिया चैनल में एक सज्जन फरमा रहे थे कि आपके शरबत का रंग आपके जीवन को प्रभावित  करता है। टीवी पर आने वाले कई  चैनलों में तथाकथित ” ज्योतिषी और बाबा ” लोगों को ऐसी ऊटपटांग  बातों से वैचारिक दृष्टि से कुंद कर रहे हैं। विचित्र बात यह है कि जब कुछ जागरूक लोग ऐसे पाखंडियों का पर्दाफाश करने के लिए आगे आते हैं तो  कुछ लोग ऐसे सवालों को भी धार्मिक आस्थाओं में उलझा देते हैं। हमें किसी की आस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का अधिकार नहीं है किन्तु जब एक ढोंगी गरम खीर का लेपन कर बच्चों का इलाज करने का दावा कर रहा हो; एक ढोंगी पीट – पीट कर महिलाओं का उपचार करने के लिए स्वतंत्र हो और जब लोग डायन का लेबल चस्पा कर किसी महिला को निर्वस्त्र कर उसे गांव में घुमा रहे हों तो ऐसा लगता है कि हम आस्था का सही अर्थ नहीं समझ पाए हैं।

हमारी वैज्ञानिक चेतना का स्तर क्या है ? इस सवाल का जवाब वे  माता – पिता देते नज़र आते हैं जो व्यावसायिक टीवी चैनलों में अक्सर यह पूछते नज़र आते हैं कि उनके बीएससी ; एमएससी  अथवा पीएच.डी  पास बेटे – बेटी को नौकरी कब मिलेगी ?  कई बार तो ये विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त  युवक – युवतियां  स्वयं प्रश्नकर्ता होते हैं। यह हमारे दिमागी दिवालयापन का द्योतक है कि हमारे लोग आज भी  तांत्रिकों पर भरोसा करते हैं और उन पाखंडियों के लिए आराम की जिन्दगी बिताने का सामान मुहैय्या करते रहते हैं जिन्हें  रोटी कमाने के लिए अन्यथा जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती।

जब हम किसी व्यक्ति से वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अपेक्षा करते हैं तो उसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम उससे  भौतिकी, रसायन अथवा दूसरे वैज्ञानिक विषयों  से संबंधित उन बातों को सुनना चाहते हैं जिन्हें इन विषयों में डिग्री  हासिल करने के लिए याद करना पड़ता है। सच बात तो यह है कि एक उच्चतम स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद कई लोग अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे व्यक्तियों से भी अधिक दकियानूसी होते हैं। परेशानी की सबसे बड़ी बात है कि हमारे मनोवैज्ञानिक अभी तक कोई ऐसा पैमाना तैयार नहीं कर पाए हैं जो यह बता सके कि व्यक्ति विशेष की ” वैज्ञानिक सोच ” का स्तर क्या है ? वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर भाषण देने वाले और इसके प्रचार – प्रसार में रूचि रखने वाले कई लोग स्वयं वक़्त – बेवक्त ऐसे कार्य करते मिल जायेंगे जिनसे रूढ़िवादिता को बढ़ावा मिलता है और समाज,देश और दुनिया को नुकसान होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति जो भी कार्य करता है, उससे समाज, देश और विश्व का हित होता है। उसके कार्यों से मानव सहित सभी जीव – जंतुओं को लाभ पहुंचता है और आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर भविष्य के निर्माण में मदद मिलती है।

बहरहाल, अक्सर हम  लोग यह मान लेते हैं कि जो व्यक्ति पण्डे – पुजारियों, तांत्रिकों, बाबाओं आदि से दूर रहते हैं; जो व्यक्ति अंतरजातीय विवाहों के पक्ष में रहते हैं;  जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण  वैज्ञानिक होता  है। कभी – कभी ऐसा महसूस होता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए सर्वप्रथम व्यक्ति विशेष का नास्तिक होना जरूरी है। दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का दायरा बहुत बड़ा है।  ढ़ोंग – पाखंड से दूर रहने वाले किसी  व्यक्ति का जीवन तभी पूर्ण रूप से  विज्ञान सम्मत माना जायेगा जब वह प्रकृति के साथ तालमेल बनाए रखने में रूचि रखता हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीवन बिताने वाले लोग अनर्गल प्रलाप नहीं करते हैं। वे धर्म, जाति तथा दूसरी सभी ऐसी बातों को जो समाज को बांटती हैं, कभी कोई तरजीह नहीं देते हैं।

ऐसा नहीं है कि हमारे पास वे लोग या साधन उपलब्ध नहीं हैं जो लोगों में वैज्ञानिक चेतना और दृष्टिकोण विकसित करने में अहम् भूमिका निभा सकते हैं।  ऐसा भी नहीं है कि हमारे लोग विज्ञान में रुचि नहीं रखते हैं। सवाल उठता है कि जब सब कुछ है तो फिर आज भी इस देश में ऐसे लोग क्यों लाखों लोगों का बेवकूफ़ बनाकर और अपने को भगवान बताकर ऐशोआराम की जिन्दगी बिता रहे हैं जिन्हें अन्यथा जेलों में होना चाहिए।  खैर, देश के सर्वांगीण विकास में दिलचस्पी  रखने वाले लोगों को ऐसी बातों से सबक लेकर आगे के रास्ते तलाश करने चाहिये। हमें बुरा लगता है जब कोई हमारे देश को संपेरों और मदारियों का देश कहता है। हो सकता है रंग भेद के हिमायती और अपने को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोग हमें नीचा दिखाने के लिए ऐसा कहते हों किन्तु हमें अपनी उन बुराइयों को नज़र अंदाज नहीं करना चाहिए जिनके कारण हमारे  यहां कई बार तो ऐसे मामले सामने आते हैं  कि अपने आप से घिन होने लगती है। सच बात तो यह है कि संस्कारों की आड़ में बचपन से ही हमें जो घुट्टी पिलाई जाती है, उसकी वजह से हमारा वह केंद्र जो विश्लेषणात्मक सोच के लिए जरूरी है, विकसित नहीं हो पाता है। जब तक हम वयस्क होते हैं, हमारे अंतर्मन में ऐसी बातें अपनी गहरी पैठ बना लेती हैं जिनसे हम उम्र तमाम असमंजस के शिकार बने रहते हैं। फलस्वरूप, हम उन बातों को नकार नहीं पाते हैं जिनका न तो कोई वैज्ञानिक आधार होता और न ही इंसानियत से कोई रिश्ता। ऐसी स्थिति में तभी बदलाव आ सकता है जब हम एक ऐसी नई पीढ़ी को तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाएं जो उन बातों का विरोध करने में मुखर और सक्षम हो जिनसे समाज का और राष्ट्र के समुचित विकास में बाधा पहुंचती है और जो लोगों को मानसिक दृष्टि से पंगु बनाती हैं।  जरूरी है कि हम अपने बच्चों को यानी इस देश की पौध को अभी से ऐसी शिक्षा देने की व्यवस्था करें जिससे वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सही अर्थ समझ सकें और एक ऐसे भारत के निर्माण में अपना योगदान दे सकें जो प्रगति के सही मायने समझता हो।

Editor, the Credible Science Pradeep's name is definitely included in the science communicators who have made their mark rapidly in the last 8-9 years. Pradeep is writing regularly in the country's leading newspapers and magazines on various subjects of science.

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