वर्ष 2021 में कोविड-19 महामारी की मार भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधानों पर भी पड़ी। बावजूद इसके हमारे वैज्ञानिकों ने न केवल वैक्सीन और दवाइयां विकसित कर कोविड-19 के खिलाफ जंग में योगदान दिया, बल्कि दूसरे क्षेत्रों में भी अनुसंधान जारी रखकर कई उपलब्धियां हासिल कीं। प्रस्तुत है 2021 में भारत की कुछ प्रमुख वैज्ञानिक उपलब्धियां:

चंद्रयान-2 से मिला चांद पर क्रोमियम और मैंगनीज की मौजूदगी का सबूत

चंद्रमा की सतह पर पानी की मौजूदगी का पता भारत के चंद्रयान-1 मिशन ने लगाया था। चंद्रयान-2 ने इसकी पुष्टि के साथ-साथ रिमोट सेंसिंग के माध्यम से पहली बार क्रोमियम और मैंगनीज के अयौगिक तत्वों का भी पता लगाया। इसरो ने बताया कि चंद्रयान-2 ने ओएचआरसी के जरिए 100 किलोमीटर की दूरी से 25 सेमी के रेजोल्यूशन पर चांद की अब तक की सबसे बेहतरीन तस्वीर उतारी है। चंद्रयान-2 द्वारा एकत्रित डेटा चंद्र विज्ञान (लूनर साइंस) के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसरो अध्यक्ष के. सिवन ने कहा कि ‘चंद्रयान-2 द्वारा इकट्ठा किया गया डेटा ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ है, वैज्ञानिक और अकादमिक समुदाय को विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए इसका प्रयोग करना है।’

 

शोधकर्ताओं ने जलवायु नियंत्रण के लिए स्मार्ट विंडो बनाने की सामग्री विकसित की

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने इमारतों में स्वत: जलवायु नियंत्रण के लिए स्मार्ट विंडो बनाने की सामग्री विकसित की। शोधकर्ताओं के मुताबिक उनके द्वारा बनाई गई स्मार्ट विंडो की सामग्री एक निश्चित वोल्टेज पर खिड़की से गुजरने वाली गर्मी और प्रकाश को नियंत्रित कर सकती है और इस तरह यह प्रभावी तौर पर स्वत: जलवायु नियंत्रण में सहायक सिद्ध हो सकती है। इस शोध का विवरण ‘सोलर एनर्जी मैटेरियल्स एंड सोलर सेल्स’ नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था।

भारतीय शोधकर्ताओं ने आपस में मिल रहे तीन सुपरमैसिव ब्लैक होल्स का लगाया पता

डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने अगस्त में बताया कि भारतीय शोधकर्ताओं ने तीन आकाशगंगाओं में तीन सुपरमैसिव ब्लैक होल्स की खोज की है, जो एक साथ मिलकर एक ट्रिपल एक्टिव गैलेक्टिक न्यूक्लियस (एजीएन) बनाते हैं, जिसमें सामान्य से बहुत अधिक चमक होती है। आकाशगंगाओं के विलय के साथ ही इनमें मौजूद ब्लैक होल भी एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं लेकिन इनका विलय नहीं हो पाता। किसी तीसरे ब्लैक होल की उपस्थिति में ये अपनी ऊर्जा उसे ट्रांसफर करते हैं और आपस में मिल जाते हैं। इस तरह की आकाशगंगाओं में अभी तक दो ब्लैक होल तो देखे गए थे लेकिन पहली बार 3 सुपरमैसिव ब्लैक होल्स पाए गए हैं!

इसरो ने 300 मीटर के दायरे में फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन को दिया अंजाम

मार्च में इसरो ने एक ऐसी कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी का सफल परीक्षण किया, जिससे भेजे गए संदेश में सेंध लगाना या हैक करना वर्तमान टेक्नोलॉजी के लिए असंभव है। इसरो ने 300 मीटर के दायरे में फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन को अंजाम दिया था। फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी सूचना प्रोसेसिंग की एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें संदेश को प्रकाश कणों यानी फोटोंस के जरिए एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है। इसरो के मुताबिक, यह परीक्षण क्वांटम प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करके बिना किसी शर्त सुरक्षित सैटेलाइट डेटा संचार की दिशा में एक प्रमुख मील का पत्थर साबित होगा। इसरो के इस कीर्तिमान के साथ ही भारत अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, चीन और जापान जैसे देशों की उस एलीट क्लब में शामिल हो गया है, जिन्होंने क्वांटम कम्युनिकेशन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं।

इसरो ने क्वांटम-की-इंक्रीप्टेड सिग्नल्स का इस्तेमाल करके लाइव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी क्वांटम क्षमताओं का प्रदर्शन किया। क्वांटम-की-इंक्रीप्टेड सिग्नल्स की खासियत यह है कि इन्हें एक खास तरह का रिसीवर ही ग्रहण कर सकता है और अगर कोई तीसरा संदेश को पढ़ने की कोशिश या डेटा के साथ छेड़छाड़ करता है तो यह इनक्रिप्शन बदल देता है। कहने का अभिप्राय यह है कि सामान्य इनक्रिप्टेड संदेशों की तुलना में क्वांटम क्रिप्टोग्राफी से भेजे गए संदेश लाखों गुना ज्यादा सुरक्षित या यूं कहें अनहैकेबल होते हैं। इसलिए इसे ‘फ्यूचर प्रूफ’ और भविष्य की टेक्नोलॉजी भी कहा जा रहा है।

 कोरोना वायरस से लड़ने के लिए इसरो ने विकसित किए 3 वेंटिलेटर

जब देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर से जूझ रहा था तब इसरो ने चिकित्साकर्मियों की मदद के लिए 3 अत्याधुनिक वेंटिलेटर विकसित किए और इनके क्लीनिकल उपयोग के लिए उसने उद्योग को इसकी टेक्नोलॉजी स्थानांतरित करने की पेशकश भी की। इसरो की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार इन वेंटिलेटर्स में अत्याधुनिक नियंत्रण प्रणाली है जिसमें वायु दबाव संवेदक, फ्लो संवेदक, ऑक्सीजन संवेदक आदि की व्यवस्था है। कम लागत से बनाए गए इन वेंटिलेटर्स में विशेषज्ञ वेंटिलेशन के प्रकार को चुन सकते हैं और टच स्क्रीन पैनल की मदद से मापदंड निर्धारित कर सकते हैं।

अक्षय ऊर्जा देश आकर्षण सूचकांक में भारत को मिला तीसरा स्थान

अर्न्स्ट एंड यंग (ईवाई) अक्षय ऊर्जा देश आकर्षण सूचकांक (रिन्यूएबल एनर्जी कंट्री अट्रेक्टिवनेस इंडेक्स) का 58वां संस्करण 2021 में जारी किया गया, जिसमें भारत को तीसरे स्थान पर रखा गया है। अक्षय ऊर्जा देश आकर्षण सूचकांक दुनिया के शीर्ष 40 देशों में उनके तैनाती के अवसरों और नवीकरणीय ऊर्जा के आकर्षण के संबंध में रैंक करता है। इस सूचकांक में, भारत ने तीसरा स्थान पाया है जबकि अमेरिका शीर्ष स्थान पर है। चीन को दूसरे स्थान पर रखा गया है।

इस सूचकांक के मुताबिक, अक्षय ऊर्जा उत्पादन में तेजी से विकास के लिए स्थितियां परिपक्व हैं। सबसे बड़ी चुनौती अपर्याप्त ग्रिड निवेश होगी। कॉर्पोरेट बिजली खरीद समझौते (पावर पर्चेस एग्रीमंट या पीपीए) स्वच्छ ऊर्जा विकास के प्रमुख चालक थे क्योंकि पर्यावरण, सामाजिक और शासन के उपाय कंपनियों और निवेशकों के लिए शीर्ष एजेंडा बन रहे हैं। गौरतलब है कि सूचकांक में भारत के उच्च स्थान का कारण अक्षय ऊर्जा पर सरकार द्वारा अत्यधिक बल दिया जाना और अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का समय पर क्रियान्वयन है।

अग्नि-5 का सफल परीक्षण

गत वर्ष 27 अक्टूबर को भारत की पहली और एकमात्र अंतरमहाद्वीपीय (इंटरकांटिनेंटल) बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 को ओडिशा में एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से देर शाम सफल परीक्षण किया गया। अग्नि-5 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) ने परस्पर सहयोग करके बनाया है। अग्नि-5 मिसाइल 5000 किलोमीटर तक के दायरे में हमला करने में सक्षम है। अग्नि-5 मिसाइल के जरिए एक साथ कई लक्ष्यों को टार्गेट किया जा सकता है (मल्टिपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल) और यह एक साथ कई हथियार (अपने भार से डेढ़ गुना ज्यादा) ले जाने में सक्षम है। अग्नि-5 के इंजन को तीन चरण वाले ठोस ईधन (सॉलिड फ्यूल) से बनाया गया है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे में इसकी मारक क्षमता और सटीकता दूसरी मिसाइलों की तुलना में काफी ज्यादा रहने वाली है।

अग्नि-5 का वजन 50 हजार किलोग्राम है। इसमें रिंग लेजर गाइरोस्कोप इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, जीपीएस, ‘नाविक’ सैटेलाइट गाइडेंस सिस्टम इन्स्टाल्ड है। यह 17.5 मीटर लंबा है और इसकी चौड़ाई 2 मीटर है। इसकी रफ्तार ध्वनि की गति से 24 गुना अधिक है। यानी अग्नि-5 एक सेकेंड में 8.16 किलोमीटर की दूरी तय करने में सक्षम है। इस मिसाइल के जरिए भारत पूरे एशिया, यूरोप, अफ्रीका के कुछ हिस्सों तक हमला करने में सक्षम है।

जैसलमेर में मिले जुरासिक युग की हाइबोडॉन्ट शार्क की नई प्रजातियों के अवशेष

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के भूविज्ञानियों को राजस्थान के जैसलमेर से हाइबोडॉन्ट शार्क की नई प्रजातियों के अवशेषों को खोज निकालने में सफलता मिली। हाइबोडॉन्ट शार्क की यह जुरासिक कालीन प्रजाति तकरीबन 6.5 करोड़ साल पहले ही विलुप्त हो गईं थी। इस खोज के दौरान भूविज्ञानियों को हाइबोडॉन्ट शार्क की नई प्रजातियों के दांतों की जानकारी हासिल हुई। इस खोज को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिस्टोरिकल बायोलॉजी, जर्नल ऑफ पैलियोन्टोलॉजी के अगस्त, 2021 के चौथे अंक में प्रकाशित किया गया था।

गौरतलब है कि जैसलमेर में मिले शार्क के ये टूटे हुए दांत, अनुसंधान दल द्वारा नामित शार्क की एक नई प्रजाति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका नाम स्ट्रोफोडसजैसलमेरेंसिस है। भारतीय उपमहाद्वीप से पहली बार इस जीनस के स्ट्रोफोडस की पहचान की गई है, जबकि एशिया में यह केवल तीसरा ऐसा मामला है, जब इस विलुप्त प्रजाति के शार्क के दांत मिले हैं।

भारत में पहली बार आईवीएफ तकनीक से हुआ बछड़े का जन्म

कृत्रिम गर्भाधान की आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक से भारत में पहली बार भैंस का गर्भाधान किया गया और बछड़े ने जन्म लिया। यह प्रयोग गुजरात की प्रसिद्ध भैंस की नस्ल बन्नी पर किया गया। मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने एक आधिकारिक प्रेस रिलीज में बताया था कि आईवीएफ तकनीक से पहली बार भैंस के गर्भाधान और बछड़े के जन्म के साथ ही भारत ओपीयू (ओवम पिक-अप)-आईवीएफ तकनीक के अगले स्तर पर पहुँच गया है। पहला आईवीएफ़ बछड़ा बन्नी नस्ल की भैंस के छह बार आईवीएफ़ गर्भाधान के बाद जन्मा। यह प्रक्रिया गुजरात के सुशीला एग्रो फार्म के किसान विनय एल. वाला के घर जाकर पूरी की गई। सुशीला एग्रो फार्म गुजरात के सोमनाथ जिले के धनेज गांव में स्थित है।

आईवीएफ़ तकनीक के जरिए भैंस के बच्चे को जन्म देने का उद्देश्य आनुवंशिक रूप से अच्छी मानी जाने वाली इन भैंसों की आबादी बढ़ाना है, ताकि दूध का उत्पादन भी बढ़ सके। भारत में भैंसों की सामान्य नस्लों जैसे ‘मुर्रा’ या ‘जफ़राबादी’ के विपरीत ‘बन्नी’ नस्ल को प्रत्येक जलवायु में आसानी से पाला जा सकता है। इस नस्ल की भैंसें कम पानी सहित कठोर जलवायु परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती हैं।

पीएसएलवी-सी51 की कामयाब लॉन्चिंग

28 फरवरी 2021 को इसरो ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से पीएसएलवी-सी51 को लॉन्च किया। पीएसएलवी-सी51 अपने साथ ब्राजील के सैटेलाइट एमेजोनिया-1 समेत 18 अन्य सैटेलाइटों को लेकर गया। इनमें 13 सैटेलाइट अमेरिका के थे। इसरो के इस कामयाब लॉन्चिंग के साथ ही भारत की तरफ से लॉन्च किए जाने वाले विदेशी सैटेलाइटों की संख्या बढ़कर 342 हो गई। लॉन्चिंग से कुछ समय पहले इसरो प्रमुख के. सिवन ने कहा था कि पीएसएलवी-सी51 हमारे लिए विशेष है। यह पूरे देश के लिए खास बात है। उन्होंने कहा कि इसके साथ भारत में अंतरिक्ष सुधारों के एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है।

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