ई. सी. जॉर्ज सुदर्शन टेक्सास यूनिवर्सिटी, ऑस्टिन में प्रोफेसर, लेखक और भारतीय वैज्ञानिक थे। इनका योगदान सैद्धांतिक भौतिकी में अद्वितीय माना जाता है। इनकी प्रमुख उपलब्धियां हैं: प्रकाशीय संबद्धता सिद्धांत (ऑप्टिकल कोहेरेंस थ्योरी), सुदर्शन-ग्लौबर निरूपण (रीप्रजेंटेशन), क्वांटम शून्य प्रभाव, प्रचक्रण-सांख्यिकी प्रमेय (स्पिन-स्टैटिक्स थ्योरम), टेकयान कण अवधारणा और विवृत क्वांटम निकाय (ओपन क्वांटम सिस्टम)।

जॉर्ज सुदर्शन का जन्म केरल के कोट्टायम जिले के पल्लम नामक गांव में 1931 में हुआ था। उन्होंने कोट्टायम के सीएमएल कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास से पोस्ट-ग्रेजुएशन की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल सांइसेज में होमी जहांगीर भाभा के साथ मौलिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी थोड़े समय के लिए काम किया। इस काम के बाद सुदर्शन रोचेस्टर यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क चले गए जहां उन्होंने रॉबर्ट मार्शल के साथ मिलकर पी-एचडी छात्र के रूप में कार्य किया और 1958 में वहीं से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। फिर वह नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी जूलियन स्चेविंगर के साथ पोस्ट डॉयरेक्टर के रूप में काम करने के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी चले गए।

जॉर्ज सुदर्शन का प्रकाशीय संबद्धता सिद्धांत (ऑप्टिकल कोहेरेंस थ्योरी) हमें बताता है की दो तरंग स्रोत पूरी तरह से सुसंगत हो सकते है यदि उनका आवृत्ति समान हो, वेवफॉर्म समान हो और उनका फेज अंतर नियत हो। यह सिद्धांत लहरों के भौतिकी की समझ देता है, और वर्तमान में क्वांटम भौतिकी में यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवधारणा बन गई हैं। सुदर्शन-ग्लौबर निरूपण, क्वांटम यांत्रिकी अर्थात क्वांटम पैमाने पर अंतरिक्ष वितरण को दर्शाने का एक तरीका है। सुदर्शन-ग्लौबर पी निरूपण द्विपदीय अवस्थाओं के निरूपण और उसके गुण की व्याख्या करता है, इस प्रकार ये सुसंगत अवस्था और थर्मल अवस्था के एकीकृत विवरण करने की अनुमति प्रदान करते है। क्वांटम यांत्रिकी में, स्पिन-सांख्यिकी प्रमेय एक कण के आंतरिक स्पिन से संबंधित है और सभी कण इस सांख्यिकी का पालन करते है। टेकयान कण की अवधारणा जॉर्ज सुदर्शन ने ही दी थी, उनका मानना था की टेकयान की गति प्रकाश की गति से भी तेज है। वैसे टेकयान एक काल्पनिक कण है। जब बात प्रकाश गति से भी तेज गति की होती है तब ऐसे किसी कण का द्रव्यमान काल्पनिक या ऋणात्मक होना चाहिए। माना जाता है की ऐसे कण का अस्तित्व केवल गणितीय रूप से संभव है लेकिन वास्तव में में ऐसे किसी कण का अस्तित्व नहीं हो सकता।

जॉर्ज सुदर्शन को 9 बार सुदर्शन-ग्लौबर निरूपण के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया, लेकिन सुदर्शन-ग्लौबर निरूपण के लिए अमेरिकी भौतिक विज्ञानी रॉय जे ग्लौबर को 2005 भौतिकी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि 2005 में कई भौतिक विज्ञानियों ने स्वीडिश नोबेल समिति को लिखा था कि सुदर्शन को सुदर्शन-ग्लौबर निरूपण के लिए पुरस्कार का हिस्सा दिया जाना चाहिए था। सुदर्शन और अन्य भौतिकविदों ने नोबेल समिति को एक पत्र भेजा कि सुदर्शन-ग्लौबर पी निरूपण में “ग्लौबर” की तुलना में “सुदर्शन” का अधिक योगदान है। लेकिन नोबेल समिति ने अपने नियम का हवाला देकर पुरस्कार में कोई बदलाव करने से साफ़ मना कर दिया।

2007 में, सुदर्शन ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि, ‘भौतिकी के क्षेत्र में 2005 नोबेल पुरस्कार मेरे काम के लिए सम्मानित किया गया था, लेकिन मैं इसे प्राप्त करने वाला नहीं था। सभी को यह पता था कि नोबेल पुरस्कार को मेरे शोध के आधार पर मेरे ही काम के लिए दिया गया था।’

जॉर्ज सुदर्शन योगदानों को देखते हुए भारत सरकार ने 2007 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें उनके कार्यकाल के दौरान सी.वी. रमन पुरस्कार (1970), बोस मेडल (1977), थर्ड वर्ल्ड अकादमी ऑफ साइंसेज अवॉर्ड (1985), मायोराना मेडल (2006), आईसीटीपी का डिरॉक मेडल (2010) और केरल शस्त्र पुरस्कार, द स्टेट अवॉर्ड ऑफ लाइफटाइम अकोमप्लिशमेंट्स इन साइंस (2013) से भी सम्मानित किया जा चुका है। इस महान भारतवंशी वैज्ञानिक का 86 वर्ष की उम्र में अमेरिका के टेक्सास में 13 मई 2018 को निधन हो गया।

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